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तन और सेहत 

पुकार मन की  

स्त्री पर एक कविता
Mind and Soul

स्त्री पर एक कविता

स्त्री! क्यों हो जाती हो बार-बार निष्क्रिय, लेती हो सहारा बैसाखियों का, क्यों बन जाती हो जूड़े मे लटकी हुई…
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कंटकों में भी तुम्हारी प्रीत का मधुमास है
Mind and Soul

कंटकों में भी तुम्हारी प्रीत का मधुमास है

मुक्त सारे बंधनों से आज ये आकाश है मिट गये किन्तु परंतु,दृढ़ हुआ विश्वास है चाँद की शीतल निशा में…
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बनेगी अपनी पहचान एक दिन
Mind and Soul

बनेगी अपनी पहचान एक दिन

स्तुति करूँ वाग्देवी की, या साधना महादेवी की।   पंत, दिनकर और निराला या प्रेरणा लूँ अज्ञेय से, कुछ लिखूँ,…
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धन संसार