बनारस की बारिश और मैं

Mind and Soul

किस्सा शायद( शायद इसलिए कि अब कुछ धुंधली याद ही रह गई हैं) 1991का है, जब मैं चौथी कक्षा में पढ़ रही थी, पापा एंबेसडर कार लेकर आए थे तो घर में सब बहुत खुश थे इसी बीच मम्मी ने कहा कि जब कोई नई वस्तु खरीद कर लाते हैं तो सबसे पहले भगवान का धन्यवाद करना चाहिए इसलिए हमलोग नई गाड़ी से सबसे पहले बनारस विश्वनाथ मंदिर जाएंगे ।पापा बड़े पापा ( ताऊ जी) बुआ सबने सहर्ष सहमति जताई, फिर क्या था सब लोग जोर शोर से तैयारियों में जुट गए, फिर वो दिन भी आया। मम्मी ने हम सभी भाई बहनों को सुबह चार बजे ही जगा कर नहला कर तैयार कर दिया हालांकि सुबह सुबह उठ कर नहाने में तो हम सबकी …….. लेकिन किसी ने चूं भी नहीं किया कि कहीं हमारा जाना ही खटाई में न पड़ जाए,फिर जैसे तैसे अंधेरे में ही गाड़ी में जाकर बैठ गए । और पता नहीं कब हमलोग निद्रा भवानी की गोद में समा गए जब हमें जगाया गया हम लोग बनारस पहुंच चुके थे और बड़े पापा हम सभी को साथ में रहने और बड़ों का हाथ पकड़कर चलने जैसी तमाम हिदायतें दे रहे थे और हम भाई – बहन सहमति में सिर हिला रहे थे, फ़िर हम पहुंचे विश्वनाथ गली, आज भी दृश्य जैसे आंखों के सामने सजीव हो उठता है पतली संकरी सी गली उसमें दोनों तरफ़ खिलौनों और रंग बिरंगी चूड़ियों से सजी दुकानें, कहीं कचौरियों की खुशबू तो कहीं जलेबियों की मिठास, हम सबको अपनी तरफ़ खींच रही थी लेकिन पहले दर्शन फ़िर भोजन का बड़े पापा का आदेश, कभी बालमन में ये विचार भी आता कि हमारे दर्शन करके आने तक हमारे पसंदीदा खिलौने बिक तो नहीं जाएंगे इसी ऊहापोह की स्थिति में भारी भीड़ के बीच हम में से किसी ने मां की गोदी में तो किसी ने पापा के कंधे पर जैसे तैसे दर्शन कर ही लिया, दर्शन हुआ या नहीं ये हम सभी भाई बहनों में से किसी का मुद्दा नहीं था हमारा ध्यान तो और मन तो गलियों में ही भटक रहा था, फ़िर वो शुभ घड़ी भी आई जब हम सबको अपने मनपसंद खिलौनों को लेने के छूट मिल गई और हमने उस छूट का भरपूर लाभ उठाया, मम्मी ने मेरे और दीदी के लिए हरे रंग की चूड़ियां खरीदी, और भाईयों के लिए प्रसाद वाले कड़े खरीदे, मैंने और मेरे छोटे भाई ने कार खरीदी मेरी कार लाल तो भाई की पीली थी उससे छोटे भाई ने हरे रंग का डिस्क खरीदा भईया और दीदी शतरंज, लूडो और न जाने क्या क्या खरीदा, उसके बाद स्वादिष्ट नाश्ता,फ़िर हम वहां से निकले कुछ दूर जाते ही बड़े पापा ने गाड़ी रोकने को कहा, मेरे बड़े पापा और पापा ,पान के बहुत बड़े शौकीन थे(थे, इसलिए कि बड़े पापा तो रहे नहीं और पापा ने अपनी बीमारियों की वजह से पान खाना छोड़ दिया)निकल पड़े ,पान की खोज में पीछे पीछे हमारे ड्राइवर शंभू भईया भी गाड़ी सहित रवाना। हम सभी मम्मी के साथ एक छोटी सी दुकान पर उनका इंतजार करने लगे इसी बीच जोरदार बारिश शुरू हो गई और बारिश ऐसी कि कुछ ही समय में रोड पर पानी जमा होने लगा और मेरी आंखों से भी बारिश शुरू ज्यों ज्यों बारिश तेज होती गई। मेरी रोने की गति भी बढ़ती गई पापा और बड़े पापा भी बारिश रुकने का इंतजार कहीं कर रहे थे शायद, तब मोबाइल जैसा कोई यंत्र भी नहीं था कि उन लोगों से संपर्क किया जा सके। इसी बीच मेरी नज़र एक पुलिस चौकी पर पड़ी और मैं दौड़कर वहां पहुंच गई पीछे पीछे मम्मी और सारे लोग। मैंने जाकर एक पुलिसकर्मी से कहा अंकल मेरे पापा कहीं खो गए हैं मिल नहीं रहे उन्हें ढूंढ कर ला दीजिए । उन्होंने पहले तो मेरे आंसू पोछे फिर मम्मी से सारी जानकारी ली। लेकिन मैं रोनी सी सूरत बनाकर उन्हें देख रही थी, तब वो मुझसे मुखातिब हुए और कहने लगे आप ने तो इतनी सुंदर फ्रॉक ( एक पीले रंग की फ्रॉक जिसमें जालीनुमा पंख सा लगा हुआ था)पहनी है इसमें तो पंख भी लगे हैं जाओ बेटा उड़कर देखो कहां हैं आपके पापा ढूंढ लाओ, इस बात पर सब लोग हंस पड़े फिर कुछ देर हमने वही रुक कर इंतजार किया बारिश थमने के बाद पापा आ गए । उस बारिश के दौरान मेरे मन में एक ही बात चल रही थी, कितना अच्छा होता अगर हमारा एक घर बनारस में भी होता, बालमन में बार बार यही बात चल रही थी, और आज इतने वर्षों बाद मैं ये संस्मरण अपने बनारस वाले घर में बैठ कर लिख रही हूं, बाबा विश्वनाथ ने मेरी प्रार्थना उसी समय स्वीकार कर ली थी शायद, लेकिन उसे कैसे कैसे नियत समय पर कितने उतार चढ़ाव के बाद कैसे मुझको यहां पहुंचाना है ये उन्होंने उसी समय तय कर लिया था, इन वर्षों में देश के विभिन्न क्षेत्रों में रही प्रयागराज तत्कालीन इलाहाबाद से सफ़र शुरू हुआ फ़िर मेरठ, भोपाल, रोहतक (हरियाणा) फिर दिल्ली पुनः अपने गृह जनपद गाजीपुर और अंततः बनारस। मनुष्य अपने भविष्य की अनेक योजनाएं बनाता है कभी कुछ दिनों बाद की, कभी कुछ महीनों या वर्षों के बाद की लेकिन ईश्वर के सामने सारी योजनाएं धरी की धरी रह जाती हैं। उनकी योजनाएं शायद हमारे जन्म से पूर्व ही नियति के रूप तय होती हैं और हम मानव करते भी वही हैं जो उनकी इच्छा होती है, इसलिए मुझे लगता है बनारस में मेरा रहना प्रभु ने पहले ही तय कर दिया था तभी तो संस्मरण का शीर्षक बनारस की बारिश और मैं ।

स्मृति तिवारी

वाराणसी

What do you feel about this post?

0%
like

Like

0%
love

Love

0%
happy

Happy

0%
haha

Haha

0%
sad

Sad

0%
angry

Angry

2 thoughts on “बनारस की बारिश और मैं

  1. सुनहरी यादों का सजीव चित्रण,जहाँ चाह वहाँ राह

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *