झाँका अपनी आँख में,देखी जो तस्वीर।
गम का था सागर वहाँ, छलक रही थी पीर।।
तोड़ रहे पग-पग हमें, कुछ पत्थर दिल लोग।
मन करता है छोड़ सब, ले लें हम अब जोग।।
लोगों का मत पूछिये, सब संवेदनहीन।
जरुरत भर को साथ हैं,साँप बने आस्तीन।।
जब चाहा तब दर्द दे, दिया कलेजा चीर।
स्वार्थी साथी हैं सभी,बने नदी के तीर।।
दिखलाते हैं आस के, लोग सब्ज हर बाग।
फिर सूखे संबंध की , सुलगाते हैं आग।।
मातम सदियों का यहांँ,करता है इतिहास।
ज्ञान ग्रन्थ सब व्यर्थ है, अगर नहीं विश्वास।
जब जब थामा प्रीति को, तब -तब खायी चोट।
कैसै हो विश्वास जब,सबके दिल में खोट।।
ज्योति नारायण।
