बेटों की विदाई

Colours of Life

बेटियां लौटी अपने आंगन में

झूले जब-जब पड़े सावन में।

अपने घर लौटने के लिए तरस गए उस घर के ही लाल

बीते कितने वसंत,कितने ही साल।

हमारे पुरुष प्रधान समाज में बेटियों की विदाई एक सामान्य सी बात होने साथ, एक प्रथा के रूप में हमारे मन -मस्तिष्क में छप सी गई है। उस विदाई के लिए बेटी के जन्म के साथ ही शुरू हो जाता है उसके लिए पाई – पाई जोड़ना। हर वर्ग अपने अपने स्तर से बेटियों की विदाई के लिए दिन – रात एक कर देता है। जो कि हमारे समाज में प्रत्यक्ष रूप से दिखता है लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से भी एक विदाई होती है जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं या उस विदाई या त्याग की कहीं चर्चा ही नहीं होती, वो है बेटों की विदाई। जी हां बेटों की विदाई, सुनने में या पढ़ने में थोड़ा अटपटा जरूर लगेगा लेकिन बेटों को भी अपना घर परिवार सब छोड़कर जाना ही पड़ता है अपनों से विदा लेना ही पड़ता है, बेटे भी अपने आत्मीय जनों के स्नेह से वंचित होते हैं, अपने उज्ज्वल भविष्य या अपने परिवार के भरण पोषण की जिम्मेदारियों के लिए ।बेटों की विदाई में उनके परिवार के आर्थिक स्थिति का अंतर ज़रूर होता है, अर्थात जिनकी आवश्यकता प्रबल होती है या जिनका आर्थिक स्तर निम्न होता है उन घरों के बेटे रोजगार की तलाश में दर -बदर, इस शहर से उस शहर भटकते रहते हैं और अपने परिवार के सपनों को पूरा करने के लिए घर से दूर एक अलग दुनिया बसाकर, अपने घर के लिए पराए हो जाते हैं। दूसरी तरफ कुछ ऐसे बेटे भी हैं जो अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए, अपने सुनहरे सपनों को साकार करने के लिए अच्छी से अच्छी शिक्षा प्राप्त करने के लिए अनजान शहरों में कठिन साधना में लग जाते हैं और फिर शुरू होती परीक्षा। ये परीक्षा मात्र शैक्षिक सत्र में शुरू या समाप्त होने वाली परीक्षा नहीं होती। वरन् ये परीक्षा होती है विषम परिस्थितियों में भी स्वयं को संयमित कर अपने दृढ़ संकल्प को पूरा करने की। इन संकल्पों को पूरा करने में या सफलता प्राप्त करने में वर्षों लग जाते हैं तत्पश्चात स्वयं को उस जगह में, उस परिस्थिति में ढालने में, बेटे फ़िर वहीं के होकर या सीधे शब्दों में कहा जाए तो अपने ही घर में अतिथि बन कर रह जाते हैं, कभी त्योहारों में आते हैं या कभी अवकाश के बिना दूर से ही त्यौहार मनाते हैं, और घर पर रह जाते हैं । उनके इंतजार में व्याकुल उनके माता पिता, जो कभी बेटों के पुरानी किताबों से धूल हटाते हैं तो कभी उनके खाली पड़े मेज कुर्सियों पर हाथ फ़िराते तो कभी उनके बिस्तर पर बैठकर गिले हुए आंखों की कोर को अपने जीवन साथी से छुपाकर धीरे से पोंछ लेते हैं, खुद को ऊर्जावान बनाने के लिए विदा हुए बेटे के आगमन की योजनाएं बनाते हैं और फिर करते हैं एक लंबा इंतजार बेटे के आगमन की……….

स्मृति तिवारी

वाराणसी

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2 thoughts on “बेटों की विदाई

  1. वाह एक अनदेखे यथार्थ का मार्मिक चित्रण।रुला दिया आपने

  2. यथार्थ चित्रण ….मन की बात कह दी आपने …हमने घर बनाने के लिए घर छोड़ा तो आज तक बस घूम ही रहे है एक अंतहीन यात्रा के लिए

    आभार
    आचार्य राकेश

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