अस्मिता

कितना सुख था तब रहती थी डरी-डरी, सह लेती थी सब कुछ। किन्तु जब से खोजने लगी हूँ अस्मिता एक ताले की दो चाबियों की तरह पड़ी रहती है मुस्कान दोनों की पाकेट्स में। जरूरत पड़ती है जब कभी खोल लेते हैं ताला अपनी-अपनी चाबी से। विद्या भंडारी कोलकाता (पश्चिम बंगाल) (यह इनकी मौलिक रचना […]

Continue Reading

हर रोज नया इम्तहान है जिन्दगी

परिन्दों सी उड़ान है जिन्दगी, हर रोज नया इम्तहान है जिन्दगी। हर पहलू से इसे पढ़ कर देखो, एक नया आयाम है जिन्दगी। दो कदम चल कर रुक गये क्यों, रोज एक नया मुकाम है जिन्दगी। यह नफरत की आग फैली है क्यों, जब मोहब्बत का नाम है जिन्दगी। मास्क ने छीन ली लबों की […]

Continue Reading

बारिश का डेरा ️

चाँदी का थाल सा चंदा का रूप झूमर हैं खेलते तारे अनूप नीरव नि:शब्द है छाया प्रतिरूप सिमटा अवधूत सा गहरा वो कूप मुग्धा है छवि सी वो शीतल स्वरूप लोकती-विलोकती जलधर बहुरूप पुरातन नित नूतन है जगती प्रारूप प्रारब्ध का दोष क्या समय रहा चुप तिरछी रेखाओं में जीवन की धूप श्रम बिन्दु सींचती […]

Continue Reading

है नहीं आनंद किंचित रात बीती, धैर्य जाये

सुप्त धड़कन, क्षीण तन मन वेदना से कसमसाये है नहीं आनंद किंचित रात बीती, धैर्य जाये भावना का ज्वार फूटे, गीत बन के बह चले भोर में चन्दा चला है सूर्य से मिल के गले इस घड़ी,उनको बुला दो हिय यही संगीत गाये सुप्त धड़कन, क्षीण तन मन वेदना से कसमसाये लाज से आरक्त मुख […]

Continue Reading

स्त्री के बारे में एक कविता

बनी रहती है कठपुतली उसका सब कुछ है उधार का।। कहाँ अपने होते हैं पाली हुई चिड़िया के पंख। कहाँ होती है उसकी अपनी कोई सोच। विद्या भंडारी कोलकाता (पश्चिम बंगाल) (यह इनकी मौलिक रचना है)

Continue Reading

प्रकृति से न करो खिलवाड़

जीवन के हर मोड़ पर नये पन्नों का खुलना मानो प्रकृति के ऋतुओं में बदलाव आना बचपन की वे तोतली बातें, वो खेलना कूदना जैसे बारिश का छमछम गिरना जवानी की चंचलता में जैसे गुलाबी ठण्ड का अहसास होना उम्र का आगे बढ़ना मानो पतझड़ में पत्तों का गिरना सुख-दुख की नैया में बैठे किनारे […]

Continue Reading

कहानी- फड़फड़ाते पन्ने

माँ….माँ….कहाँ हो…..लगभग चिल्लाते हुए अमिय अपनी माँ को पुकारता हुआ रसोई में गया। माँ सब्जी काट रही थी। क्या हुआ अमिय? कहते हुए माँ जैसे ही पलटी, वैसे ही अमिय के चेहरे की खुशी हैरानी में बदल गयी। अमिय- यह क्या हुआ माँ…माथे पर पट्टी? फिर पापा ने….. माँ- कुछ नहीं रे, गिर गयी थी। […]

Continue Reading

हरे पत्तों के गिरने का कोई मौसम नहीं होता

मिले होते जो राहों में, तो कोई गम नहीं होता जुस्तजू हो गयी होती ये दिल पुरनम नहीं होता लुटे हम प्यार की खातिर, मगर कुछ भी नहीं हासिल वफ़ा करते वफ़ा से वो, तो दिल में खम नहीं होता सितारे जगमगाते हैं, मगर रोशन कहाँ होते जलाते दीप देहरी पे, तो वो मातम नहीं […]

Continue Reading

तुम्हें मुझसे प्रेम नहीं है

कैसे मान लूँ मैं, जो तुम कहते हो कि प्रेम नहीं है। मेरा नाम आते ही तुम्हारे होंठों पर मुस्कान का तैर जाना, गैरों की बातों में भी जिक्र मेरा करते हो प्रमाण है इस बात का, और तुम कहते हो कि प्रेम नहीं है। तस्वीर मेरी देखते हो दिन में सौ दफा, यादों को […]

Continue Reading

आँसू

नहीं मचाती शोर कभी ये, चुपके ही रह जाती। अश्रु भरी अँखियों की पीड़ा, व्यथा कथा कह जाती।। लिए गठरिया कर्तव्यों की, प्रतिपल चलती नारी। माँ बेटी भार्या बनकर नित, अपना जीवन हारी। अंतर्मन में चीख दबाकर, दुख सारे सह जाती। अश्रु भरी अँखियों की पीड़ा, व्यथा कथा कह जाती।।1।। नहीं भावना समझे कोई, स्वार्थ […]

Continue Reading