नीलिमा मिश्रा की रचना- देहरी

जीवन संझा की देहरी पर आज बैठी सोच रही हूँ मैं श्रांत, क्लान्त तन मेरा मन मेरा अवसान की ओर ढलते ढलते धूमिल होता जा रहा देख रही हूँ मैं दूर कहीं बालकिरणों जैसी सुनहरी लालिमा लिये वो अल्हड़, खिलंदड़ा सा मासूम बचपन हँस हँस कर बुला रहा इशारे से फिर अपने पास मुझे खुली […]

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अपनी हर सोच और बोल को आशीर्वाद बनायें – बीके शिवानी (BK Shivani)

सोच और बोल की सकारात्मकता और नकारात्मकता के बारे में आध्यात्मिक शिक्षक बीके शिवानी (BK Shivani) ने आज कू (Koo) के माध्यम से एक टिप्पणी की है। उन्होंने कू पर लिखा है, “मेरे बच्चे कहना नहीं मानते, पढ़ते नहीं, खाना नहीं कहते…” सोच और बोल घर के वातावरण में फैल जाते हैं, प्रभाव बच्चों पर […]

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मधु सक्सेना की रचना- ऐसे ही चलते रहना

तेरे माथे पर लिख देना है मुझे अपने होठों से एक दुआ .. भर देना चाहती हूँ तेरी आँखों में जगमगाते उम्मीद और सपने .. रख देना है तेरे होठों पर लहलहाती फसल सी हँसी .. तेरे चेहरे पर मल देना है सूरज का तेज चाँद का रंग लिए … लिख देना है तेरे सीने […]

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नीलिमा मिश्रा की रचना- माटी की व्यथा

मैं तो कच्ची माटी ही थी, तुम्हारे समीप हे मेरे राम, तुमने मुझे अपने रंग में रंग, दिया एक मुझे नया आयाम। ढल गई तुम्हारे साँचे में प्रभु, बन गई मैं तुम्हारी सहगामिनी, मिला तुम्हें चौदह बरस का बनवास, चली संग तुम्हारे बन के अनुगामिनी। दुष्ट रावण के चंगुल से छुड़ाया फिर भी तुम्हारे नैनों […]

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वर्षा रावल की रचना- मिठास मत घोलना

नर्म-नर्म गोले सी पहली बार आँखें खोलीं दुनिया में आगमन अभी ही हुआ था… तुम्हारी नई-नई माँ पीड़ा में भी मुस्कुरा रही थी मिठास से लबरेज़ जो थी… तुमने जैसे ही रोने को मुँह बनाया दो बूँद शहद घुल गया तुम्हारे मुँह में… और इस मिठास को चाटने की कला तुम्हें आ गई… थोड़ी बड़ी […]

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ज्योति नारायण की दो कविताएँ

दीप हमने है जलाया दीप हमने है जलाया ओ सजन तेरे लिए। देहरी अँगना है ‌सजाया ओ सजन तेरे लिए।।२ प्रेम की यह शुभ्र ज्योति हो उजासित पथ तुम्हारा दीपिका की मल्लिका सी भर सके सुख सौख्य सारा। यह हृदय हमने बिछाया ओ सजन तेरे लिए……। स्नेह का दीपक जलाया ओ सजन तेरे लिए।।२ दीप […]

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दीपावली पर ज्योति नारायण की दो रचनाएँ

  एक कविता- लघु दिया सूरज आगे लघु दिया क्या यही अमावस पूर्ण ओम हुई ज्ञान ज्योति की उज्जवल किरणें भर प्रकाश यह व्योम हुईं छुई-मुई नन्हीं सी बाला झूम-झूम कर मौन हुई ना जाने किस प्रीत में पागल लहक-लहक यही होम हुई भर आकूत आवर्त घिरी रही फिर भी प्रखर हो धूम्र हुई श्रम […]

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दियों के संग, दीपावली के रंग

अनंत दियों की बौछार, कई लाल, कई पीले सबका एक ही मकसद, अँधेरे से उजाले की ओर हवा में अजीब सी महक। दीपावली की एक हलचल न्यारी सी घर-घर में एक नया उत्साह हर कोई आप्त जन से मिलने को बेकरार यह पर्व धन दौलत आरोग्य दे, विद्या बुद्धि शक्ति की मंगल कामना आप्तजन परिजनों […]

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मधु सक्सेना की रचना- इंतज़ार है

आया त्यौहार भर गई उमंग प्रकृति ने किया श्रृंगार महकने लगी दिशाएँ फिर भी … इंतज़ार है उस महक का जो महका दे मनुष्य को सदा-सदा के लिए … आ गए सब .. सज गए रिश्ते घर की गोद भर गई स्वाद घुलने लगे गुजिया, पपड़िया के खनकने लगी हँसी . फिर भी .. इंतज़ार […]

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ज्योति नारायण की रचना- बेटियाँ

बेटियाँ दिल के करीब रहती हैं। सुख दु:ख में शरीक रहती हैं। माँ की मूरत में ये ही ढलती हैं। ममता की सूरतों में पलती हैं। प्रसव की पीड़ा जो माँ ने सही वही यह धरती लिये चलती हैं। बीज को कोख में लहू देतीं फिर लगा छातियों से रहती हैं। कभी किसी से न […]

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