मेरा, केवल मेरा सूरज

आज फिर आया था वह देखो जा छुप रहा है, झुरमुटों में, कहने पर नहीं सुनता, रोकने पर नहीं रुकता वह कहाँ मानता है एक भी बात बताया था मैंने उसे कल रात ठीक नहीं इस तरह हमारा मिलना मुझसे मिलने के लिए तुम्हारा दिन भर जलना हौले से मुस्कुराया था वह। वही, हाँ वही […]

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सूख जाएगी कविता की नदी

युगों बीत गए छलछलाती नदी को देखे बहुत पानी हुआ करता था उसके दिल मे …. अपना प्रेम दे देने को आतुर.. ममता सम्वेदना से लबरेज पूरी तरह स्वाभाविक वास्तविक….. फिर दौर आया रेत के सैलाब का नदी न रहने दी नदी , सुखा दिया छलछल पानी को वैसे ही मरने लगी नदी जैसे भरी […]

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अर्धनारीश्वर

ना तू अबला ना तू सबला ना नर है ना तू नारी । तुझ में ताकत पुरुष के जैसी फिर भी तू बेचारी। तू सम्मान की अधिकारी, फिर भी समाज से बाहर कभी कहो अपनी व्यथा भी, क्या है तेरे अंदर। तुझमें पौरुष कूट-कूट के, ममता भी तुझ में न्यारी । फिर क्यों तुझको भावहीन […]

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खामोशी से कहना है

  हमें कर्मशील सदा  रहना है बस नदी सा बहते रहना है पथ में आये शूल या पत्थर हमें आगे सदा ही बढ़ना है अनजाने पथ पर भी राही सोच समझ कर चलना है रात जले जो दीप देहरी सुबह उसे तो बुझना है आज हैं साँसें, कल न होंगी एक दिन इसने छलना है […]

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आदिम युग का शुभारंभ

उतार फेंके हैं हमने वस्त्र लज्जा के नुकीले कर लिए हैं हमने अपने दाँत अपने नाख़ून भर ली है हिंसा अपनी शिराओं में ताकि कर सकें सामना उस शिकार का जिसने नहीं किये नुकीले अपने दाँत अपने नाख़ून, फिर भी प्रतिरोध करना जानते हैं हमे उकसाना जानते हैं नहीं देख सकते उनकी वाहवाही डरना जरूरी […]

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नारी, एक चमकीला तारा, टूट कर गिरता हुआ

नारी नारी एक शक्ति है, श्रद्धा है, जननी है, धरती है। फिर शापित क्यों है? विचलित मन से निकली है यह कविता क्या ऐसा होना उचित है? नारी बेरोशन एक चमकीला तारा टूट कर गिरता हुआ, सड़ी-गली परम्परा की लपलपाती लपटों के बीच घिरी झुलसती हुई कोई एक स्मृति, किसी सरोज की खण्डित प्रतिच्छवि। सदियों-सदियों […]

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मूल्यांकन

सतह में रहकर समुद्र की गहराई नापना उतना ही मुश्किल होता है जितना कि आकाश की परिधि नापना पर फिर भी हम कर दे देते हैं मूल्यांकन अपने चश्मे से देखकर दे देते हैं परिणाम पूरा भरोसा दिलाकर सागर की गहराई को डरावनी शक्ल में, या आकाश को भयानक रूप में भले ही फर्क नहीं […]

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उलझन नारी जीवन की

कैसी है ये उलझन, भागा-भागा फिरे है मन कर्तव्यों के जीवन में, कहीं नहीं मिले है चैन एक को पकड़ूँ, दूजा खोऊँ तकिया गीला, नित सिसकूँ रोऊँ किससे कहूँ मैं दिल की बात अपने भी सोचें, नहीं मुझमें जज़्बात। बँट गई ज़िन्दगी मेरी टुकड़ों की खुशियाँ मेरी हर कोई सही अपनी दृष्टि में गलत हूँ […]

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नसीहत

  पुरुष चाहता है अपनी नसीहतों से स्त्री को मूर्ख साबित करना। बार-बार आहत करके अपनी जीत का एहसास कराना। स्त्री के भीतर जो भी मूल्यवान है उसे तहस-नहस करना। वह संस्कारों से बँधी पिसी रहती है घुन की तरह। उसका अधिकार रिश्तों को समेट कर रखना ही है। पुरुष जानना ही नहीं चाहता कि […]

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माँ

माँ अनगढ़ सी खुद रहती, पर सुंदर गढ़े तस्वीर। गीत बनाती जीवन के, कर कितने ही तदबीर।। माँ की लोरी गीता है, और है रामायण की बात। दुख बच्चों का दूर है करती, करे प्रेम बरसात।। इनकी डांँट औ थपकी में है, जीवन भर का सार। मांँ के आँचल में है सोता, यह सारा संसार।। […]

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