कोने

सुनो! कौन कहता है कोने सूने या बेवज़ह होते हैं लगा दी जाती हैं लताएँ निःशब्द आँगन के कोनों में चहचहाने उन चिड़ियों को जो बैचैन है अपनों के पलायन से, वीराने ड्राइंग रूम की छटपटाहटें करने दूर कोनों में रख दिये जाते हैं सूखे फूलों से सजे गुलदान ठीक उसी तरह जैसे भीतर से […]

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जिन्दगी सँवारने का सुनहरा अवसर है ये

आज हम सभी इस महामारी के बीच ऐसे परेशान हैं कि क्या करें, क्या ना करें। आज हर व्यक्ति उहापोह की स्थिति में है, रोजगार वाले हों या बेरोजगार, सरकारी नौकरी वाले हों या व्यवसाय करने वाले हों, पुरुष हों या महिला, बड़े हों या बच्चे, सभी अपनी-अपनी समस्याओं से निजात पाना चाहते हैं। लेकिन […]

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मैं वृक्ष हूँ

  मैं वृक्ष हूँ अपनी आत्मकथा सुनाता हूँ अपने मन की बात बतलाता हूँ सदियों से खड़ा साक्षी हूँ हर सुख-दुख के लम्हों का द्रष्टव्य मैं ही तो गवाक्षी हूँ सभ्यता की उत्पत्ति देखी विनाश को भी देख रहा हूँ मौन साधना की परिणिति अविचल ख़ुद को रख रहा हूँ जितना ऊपर बढ़ जाता हूँ […]

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स्त्री पर एक कविता

स्त्री! क्यों हो जाती हो बार-बार निष्क्रिय, लेती हो सहारा बैसाखियों का, क्यों बन जाती हो जूड़े मे लटकी हुई वेणी। महकती हो फिर से वाणी बनने के लिए। क्यों बिछ-बिछ जाती हो दूब की तरह।   क्या नहीं जानती तुम अपना रास्ता स्वयम् तलाशना। विद्या भंडारी कोलकाता (पश्चिम बंगाल) (यह इनकी मौलिक रचना है) […]

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कंटकों में भी तुम्हारी प्रीत का मधुमास है

मुक्त सारे बंधनों से आज ये आकाश है मिट गये किन्तु परंतु,दृढ़ हुआ विश्वास है चाँद की शीतल निशा में ख्वाब पोसे जायेंगे भोर की शुभ अरुणिमा में आपका आभास है मिट गये किन्तु परंतु, दृढ़ हुआ विश्वास है देह से वैराग्य तक तुमको सदा धारण किया कंटकों में भी तुम्हारी प्रीत का मधुमास है […]

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बनेगी अपनी पहचान एक दिन

स्तुति करूँ वाग्देवी की, या साधना महादेवी की।   पंत, दिनकर और निराला या प्रेरणा लूँ अज्ञेय से, कुछ लिखूँ, क्या लिखूँ कैसे पीछे हटूँ अपने ध्येय से।   मन में विचार नित नए कौंधते, रहीम, सूर, तुलसी सा लिखूँ या सीख लूँ, रसखान और हरिऔध से।   कहाँ से सीखूँ भाषा शैली, मुझको शरण […]

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खुशी मेरी सास की

क्या सुना है, अपनी सास को खुश कर पायी है कोई बहू आखिर इतनी लड़कियाँ देख कर घर में लायी एक बहू। अब इसमें इतनी कमियाँ आखिर कहूँ तो किससे कहूँ मेरी बेटी इतनी गुणी है है इतनी कामकाजी पर बिल्कुल ही कामचोर निकली है मेरी बहू। बिना कोई सिंगार करे ही सोनी दिखती मेरी […]

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सच है, सीखने की कोई उम्र नहीं होती ‌

हर दिन हम कुछ नया सीखते हैं, वो अलग बात है कि कई बार हमारा ध्यान उस तरफ नहीं जाता। हर घटना-परिघटना से हम सीखते अवश्य हैं और इस सीखने की शुरुआत बचपन से ही हो जाती है। खेल-खेल में न जाने कितनी सारी बातें, कितने करतब, कितना ज्ञान हमारे अंदर समाहित हो जाता है, […]

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नारी देह से परे भी कुछ है

बुद्धि, युक्ति, व्यंजना करे जो गूढ़ मंत्रणा वो सूर्य सी प्रदीप्त है नहीं कपोल कल्पना। ललाट उच्च, नेत्र शील ज्ञान सिंधु है भरा अधर कमल से दीखते, हैं बोलते खरा-खरा हृदय पुनीत भाव से गृहस्थ धाम संजना वो सूर्य सी प्रदीप्त है नहीं कपोल कल्पना। वो शुभ्र है या श्याम है नहीं वो मात्र चाम […]

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स्त्री और पौरुष

तुम्हारे पौरुष के पाँव जिन्दा हैं क्योंकि मैंने समेट रखा है अपने पाँवों को रेशम के कीड़ों की तरह। तुम्हारे पौरुष की आँखें जिन्दा हैं क्योंकि मेरी आँखें झुकी हुई हैं शर्मीली दुल्हन की तरह। तुम्हारा पौरुष जीवित है क्योंकि मैंने अपनी अस्मिता को छिपा रखा है अपने आँचल में। तुम्हारा सिर गर्व से ऊँचा […]

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