बात नए वर्ष की है यानि पहली जनवरी 2026 की । मैं और मेरी बेटी नए वर्ष में क्या करना है और क्या नहीं करना है इस विषय पर चर्चा कर रहे थे, मैंने यूं ही अपनी बेटी से कहा कि नए वर्ष में नया संकल्प लो कि तुम पुस्तकों से दोस्ती करोगी और फ़ोन से दूरी। उसने मुस्कुराते हुए कहा पुस्तकों से दोस्ती तो मैं कर लूंगी लेकिन फ़ोन से दूरी बनाने में थोड़ा समय लगेगा। मैंने कहा ठीक है क्योंकि कोई भी आदत अचानक छूट जाए या बन जाए ये आसान नहीं, कुछ देर सोचने के बाद उसने कहा पुस्तकों से दोस्ती तो है ही भले ही वो मेरी स्कूल की पाठ्य पुस्तकें हैं और ये दोस्ती तो और प्रगाढ़ करनी ही पड़ेगी क्योंकि मार्च में मेरी बोर्ड परीक्षा है और फ़ोन से दूरी भी रखनी ही पड़ेगी। फ़िर बिटिया ने अचानक मुझे एक सुझाव दिया ,मम्मी आप मेरे जन्मदिन पर (जो कि फरवरी में था) मुझे कुछ किताबें ही गिफ्ट कर दें, मैंने बेटी की बुद्धिमत्ता पर मुस्कुराते हुए हामी भर दी। फिर उसने बहुत खोजबीन के बाद कुछ पुस्तकों के नाम दिए और मैंने जन्मदिन पर वो पुस्तकें उपहार स्वरूप दे दी। जनवरी,फरवरी, मार्च , ये तीन महीना जन्मदिन और बोर्ड परीक्षा में कब बीत गया पता ही नहीं चला और शुरू हुआ किताबों से दोस्ती का सिलसिला । आज जब मैं ये लेख लिख रही हूं बिटिया रानी के पास 27 पुस्तकों का संग्रह हो गया है जिसमें से कुछ हिंदी तथा कुछ अंग्रेजी की पुस्तकें है जिसमें Once upon a curfew,The palace of illusion,A Shimla affair, शरतचन्द्र जी की मंझली दीदी, दत्ता, मुंशी प्रेमचंद जी की बैर का अंत, कुछ कविता व दोहा संग्रह ” डाल डाल टेशू खिले” आदि शामिल रहीं।
जो भी पुस्तक पढ़ती उसके बारे में बातें करती रही, इन पुस्तकों में सबसे ज्यादा जो प्रभावित किया वो है The palace of illusion जो कि महाभारत की कथा पर आधारित है, इसको पढ़ने के बाद कभी द्रौपदी तो कभी कर्ण के लिए दुःखी होती तो कभी धृतराष्ट्र व भीष्म पितामह पर रोष व्यक्त करती कभी विदुर से प्रभावित होती रही।
लेकिन मेरे लिये जो हर्ष का विषय रहा वो ये कि मेरी बेटी जो रिल्स, मीम्स ,ट्रेडिंग song की बातें करती थी, अचानक मुझसे संपूर्ण महाभारत पढ़ने के लिए उसका हिंदी अनुवाद की पुस्तक मांग रही है और मैंने उससे वादा भी किया कि मैं महाभारत का सटीक हिंदी अनुवाद ले कर उसे दूंगी।
तो इन छुट्टियों में मेरी बेटी की दोस्ती तो हो गई किताबों से बहुत अच्छा लगा, लगभग 80% तक फ़ोन से दूरी भी बन गई है।
आज छोटे बच्चे हों या किशोरवय बच्चे सभी के माता पिता बच्चों के मोबाइल प्रेम से परेशान हैं उनसे ये आदत डांट या मार पीट कर के नहीं छुड़ाया जा सकता बल्कि अभिभावक उसके बदले में एक अच्छा व रोचक विकल्प रखने का प्रयास करें वो चाहे खेलकूद हो किताबें हो या कोई भी रचनात्मक कार्य ही हो । यदि वो विकल्प किताबें हो तो और भी अच्छा क्योंकि किताबों से दोस्ती हो जाए तो हमारे बच्चों के लिए और भी अच्छा है। जब मैं छोटी थी तो हम सभी भाई -बहनों को को पढ़ने के लिए घर के बड़े अक्सर बोलते और हम मुंह बना लेते थे ।तब उसका भी एक विकल्प हमें दिया गया कि कुछ भी पढ़ो चाहे वो नन्दन चंपक या चंदा मामा जैसी बाल पत्रिकाएं हो या ज्ञान वर्धक विज्ञान प्रगति हो या आपकी रुचि के अनुसार क्रिकेट सम्राट हो ( ये सभी पत्रिकाएं हमारे बचपन में आती थीं) या समाचार पत्र पढ़ो लेकिन पढ़ो । उसके पीछे मां और बुआ का तर्क था कि कुछ देर बैठ कर पढ़ने की आदत तो विकसित होगी क्योंकि बचपन में तो सिर्फ़ खेलने कूदने और उधम मचाने में हम व्यस्त रहते थे। आज उनका ये तर्क मुझे सही भी लगता है कि खेलकूद तो बच्चों के शारीरिक विकास के लिए आवश्यक है लेकिन मानसिक विकास के लिए, सृजनात्मकता के लिए एकाग्र होकर बैठना और पढ़ना भी उतना आवश्यक है इसलिए किताबों से दोस्ती आपके बच्चों के लिए एक अच्छा विकल्प है।
स्मृति तिवारी

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